निशांत तिवारी
बिलासपुर। विकास और औद्योगिक विस्तार के दावों के बीच बिलासपुर जिले के कर्रा और आसपास के गांवों में रहने वाले लोग एक अलग ही संघर्ष झेल रहे हैं। क्षेत्र में संचालित हिंद एनर्जी एंड कोल बेनिफिकेशन लिमिटेड कोल वाशरी से निकलने वाली कोयले की धूल सीधे फेफड़े में सांस लेते समय घुस रहा है और प्रदूषण को लेकर ग्रामीणों में खासा नाराजगी है।

लोगों का आरोप है कि उद्योगों की गतिविधियों का सबसे बड़ा असर गांवों की सेहत, खेती और पर्यावरण पर पड़ रहा है, लेकिन उनकी समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा। जमीनी स्तर पर जब हमारी टीम ने कर्रा, गतौरा, फरहदा, खैरा, लगरा और आसपास के गांवों के ग्रामीण से बात की तो बताते हैं कि कोयले की महीन धूल ही खा और पी रहे हैं। सुबह घरों की सफाई से लेकर पीने के पानी को सुरक्षित रखने तक हर काम प्रदूषण की चुनौती के बीच करना पड़ रहा है। घरों की छतों, आंगनों, पेड़-पौधों और खेतों पर जमी काली परत ग्रामीणों की चिंता बढ़ा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि क्षेत्र में सांस संबंधी बीमारियां, एलर्जी, आंखों में जलन और खांसी जैसी समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं। बच्चों और बुजुर्गों पर इसका सबसे ज्यादा असर देखने को मिल रहा है। कई परिवारों का आरोप है कि प्रदूषण के कारण लोगों को बार-बार स्वास्थ्य केंद्रों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।

विस्तार योजना के प्रति लोगों में भारी आक्रोश
इसी बीच हिंद एनर्जी एंड कोल बेनिफिकेशन लिमिटेड की प्रस्तावित विस्तार योजना को लेकर ग्रामीण कड़ा विरोध जता रहे है। उनका कहना है कि जब वर्तमान स्थिति में ही प्रदूषण और पर्यावरणीय समस्याओं को लेकर सवाल उठ रहे हैं, तब क्षमता विस्तार से कई तरह की नई समस्याएं पैदा हो जाएंगी। ग्रामीणों का मानना है कि किसी भी औद्योगिक परियोजना के विस्तार से पहले गांव में पूर्णतः सहमति नहीं ली जाती है, जिसका उन्होंने कड़ा विरोध दर्ज कराया है। साथ ही उनका कहना है कि जनसुनवाई केवल औपचारिक ही बन गई है।

क्षेत्र के स्कूल प्रभावित, पढ़ाई पर पड़ रहा असर
क्षेत्र के स्कूलों में पढ़ने वाले छात्र भी इस समस्या से अछूते नहीं हैं। अभिभावकों का कहना है कि खुले मैदानों और स्कूल परिसरों में उड़ती धूल बच्चों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है, जिससे उनकी पढ़ाई पर भी गहरा असर पड़ रहा है। डॉक्टर एलपी कुमार से बातचीत में उन्होंने बताया कि यह धूल बच्चों के फेफड़े में सीधा घुस रहा है, जिससे उनकी उम्र घट रही है और सांस लेने समस्या जैसी भी पैदा हो रही है।

खेती हो रही बर्बाद और जल हो रहा प्रदूषित
ग्रामीणों के अनुसार कोयले की धूल खेतों तक पहुंच रही है, जिससे फसलों की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। किसानों का कहना है कि खेती उनकी आजीविका का मुख्य साधन है, लेकिन प्रदूषण के कारण भविष्य को लेकर चिंता गहराती जा रही है। वहीं क्षेत्र में भूजल स्तर गिरने और जल स्रोतों के प्रभावित होने की शिकायतें भी लगातार सामने आ रही हैं। कई ग्रामीणों का दावा है कि पहले की तुलना में पानी की उपलब्धता कम हुई है। इसके साथ ही बताया कि प्रदूषित यानी कोयलयुक्त पानी सेवन कर रहे हैं। जबकि स्थानीय नदी-नालों की स्थिति को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
ग्रामीणों बोले – पहले वर्तमान स्थिति की हो जांच
क्षेत्रवासियों ने मांग की है कि प्रदूषण, जल स्रोतों की स्थिति और स्वास्थ्य प्रभावों से जुड़े सभी तथ्यों को सार्वजनिक किया जाए। साथ ही स्वतंत्र जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाने की भी मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन ऐसा विकास स्वीकार्य नहीं हो सकता जिसकी कीमत गांवों के स्वास्थ्य, किसानों की जमीन और आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़े।
